प्रत्येक व्यक्ति  एक कैनवास की तरह है , जिस पर स्वकर्म रुपी तूलिका से वह  अपने जीवन रुपी चित्र उकेरता रहता है , जिसका वह स्वंय पूर्णतया जिम्मेदार रहता है , अन्य कोई भी कदापि नहीं । इसीलिए उसके द्वारा किए गए प्रत्येक कर्म  पुरुषार्थ और प्रारव्ध रुप में  सदैव ही उसके साथ रहते हुए उसका वैसा ही निर्माण एवं निर्धारण करते रहते हैं । यह एक अटल सत्य है ।  



🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

Comments